रविवार, 8 अगस्त 2010

आठ




भूख से बिलख-बिलख के रो रही है ज़िन्दगी
अपने आंसुओं को पी के सो रही है ज़िन्दगी


चल पडी थी गांव से तो रोटियों की खोज में
अब महानगर में प्लेट धो रही है ज़िन्दगी


या सडक की कोर पर ठिठुर रही है ठण्ड में
य कदम-कदम पसीना बो रही है ज़िन्दगी


नौचते है वासना के भूखे भेडिये कभी
जब्र की कभी शिकार हो रही है ज़िन्दगी


हड्डियों के ढांचे-सी खडी महल की नींव में
पत्थरों को नंगे सर पे ढो रही है ज़िन्दगी


अजनबी-से लग रहे है अपने आप को भी हम
सोचिये कि गैर क्यूं ये हो रही है ज़िन्दगी


बस रही है झोपडी में घुट रही अंधेरों में
कब से रोशनी की आस पो रही है ज़िन्दगी


कीजिये "यकीन" मैंने देखी है हर जगह
लीजिये संभाल वरना खो रही है ज़िन्दगी
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4 टिप्‍पणियां:

  1. कीजिये "यकीन" मैंने देखी है हर जगह
    लीजिये संभाल वरना खो रही है ज़िन्दगी..wah wah bahut khoob...aap isko Bal Thakre ke pass bhejiye taki unko bhi akal aa jaaye

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  2. अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (9/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  3. क्या बात है साहब ! बहुत उम्दा !!

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