गुरुवार, 10 जून 2010

न वो गिरजा, न वो मस्ज़िद, न वो मन्दर बनाते हैं
लडाते हैं हमें और अपने- अपने घर बनाते हैं


हम अपने दम से अपने रास्ते बहतर बनाते हैं
मगर फ़िर राहबर रोडे यहां अक्सर बनाते हैं


कहीं गड्ढे, कहीं खाई, कहीं ठोकर बनाते हैं
यूं कुछ आसानियां राहों में अब रहबर बनाते हैं


बनाते क्या हैं, बहतर ये तो उनका ही खुदा  जाने
कभी खुद को खुदा कहते कभी शंकर बनाते हैं


अभयदानों के है किस्से न जाने किस ज़माने के
हमारे वास्ते लीडर हमारे डर बनाते हैं


न कुछ भी करते- धरते हों मगर इक बात है इनमें
ये शातिर रहनुमा बातें बहुत बहतर बनाते हैं


न जाने क्यूं उन्ही पर है गडी नज़रें कुल्हाडों की
कि जिन शाखों पे बेचारे परिन्दें घर बनाते हैं


इसी इक बात पर अहले- ज़माना है खफ़ा हम से
लकीरें हम  ज़माने से ज़रा हट कर बनाते हैं


दिलों में प्यार रखते हैं कोई शीशा नहीं रखते
बनाने दो वो नफ़रत के अगर पत्थर बनाते हैं


"यकीन" अब ये ज़रूरी है यकीन अपने हो फ़ौलादी
कि अफ़्वाहों के अब वो बेखता नश्तर बनाते हैं
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3 टिप्‍पणियां:

  1. आईये सुनें ... अमृत वाणी ।

    आचार्य जी

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  2. ham spno ke mahal bade arman banate hai |

    or wo mitti ke garode samjh girate hai ||

    bahut khub

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  3. द्विवेदी जी के यहाँ पढ़ते आये हैं यकीन साहेब को..आज यहाँ पढ़कर भी अच्छा लगा.

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